अपनी पड़ताल में हमने पाया कि राजस्थान अकेला ऐसा राज्य नहीं है जहाँ सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कोटे का प्रबंध किया गया है.
राज्यों के मेडिकल एजुकेशन विभाग के अनुसार गुजरात के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 181, हिमाचल प्रदेश में 22, हरियाणा में 20 और पंजाब में 45 सीटें एनआरआई कोटे के लिए निर्धारित की गई हैं.
इन राज्यों में भी एनआरआई कोटे से एमबीबीएस करने की सालाना फ़ीस 13 लाख से 19 लाख रुपये के बीच है.
गुजरात के मेडिकल एजुकेशन विभाग ने ये दावा किया कि उनके यहाँ एनआरआई कोटे के तहत सिर्फ़ उन स्टूडेंट्स को दाख़िला दिया जाता है जिनके माता-पिता या फिर वो ख़ुद एनआरआई हों.
इन पाँच राज्यों के अलावा बीबीसी ने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के मेडिकल एजुकेशन विभाग से भी बात की जिन्होंने दावा किया कि उनके राज्य में फ़िलहाल सिर्फ़ प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में ही एनआरआई कोटे की व्यवस्था है.
पर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कोटे के तहत छात्रों के एडमिशन से क्या प्रभाव हो सकते हैं? इसपर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डॉक्टर केके अग्रवाल ने बीबीसी से बातचीत में एक अन्य नज़रिया पेश किया.
डॉक्टर अग्रवाल ने कहा, "अगर यह मा
उनकी पत्नी कुछ ही समय पहले मां बनी थी और छुट्टी पर चल रही थीं.
हर्कनन ने स्पेन के मलागा में किराये का घर लिया और वहीं से आईटी कंपनी में सीनियर टीम मैनेजर की नौकरी करते हुए परिवार को भी समय दिया.
उनके काम में अपनी टीम के 20 सदस्यों को मैनेज करना भी शामिल था. अब वह हेलसिंकी लौट आए हैं. उनका कहना है कि उनका समय "जितना सोचा था, उससे भी शानदार गुजरा."
हर्कनन ऑनलाइन मैसेजिंग टूल स्लैक और वीडियो कांफ्रेंस के ज़रिये अपने सहकर्मियों के संपर्क में रहते थे. बीच-बीच में वह फ़िनलैंड भी चले आते थे.
उनका शेड्यूल ऑफिस के घंटों में बंधा हुआ नहीं था, फिर भी वे महत्वपूर्ण बैठकों में फ़ोन पर संपर्क में रहते थे.
स्पेन का मौसम भी उनको रास आता था, जिसके बारे में उनको लगता है कि उससे उनकी उत्पादकता बढ़ती है.
हर्कनन अपनी आईटी कंपनी एंबिंशिया के पहले कर्मचारी थे जिनको इतनी दूर रहकर नौकरी करने की इजाज़त मिली. लेकिन यह कंपनी काम में लचीलेपन को बहुत पहले से तवज्जो दे रही थी.
न भी लिया जाए कि इस कोटे के तहत एनआरआई छात्र मेडिकल की पढ़ाई करने भारत आएंगे तो इसकी क्या गारंटी होगी कि पढ़ाई पूरी करने के बाद वो भारत में ही अपनी सेवाएं देंगे. ये बात सही है कि वो बहुत अधिक फ़ीस दे रहे हैं. लेकिन एमबीबीएस की डिग्री के लिए जो क़ीमत विदेशी होने के नाते वो देने वाले हैं, वो उनकी मुद्रा में बहुत कम होगी. यानी सस्ते में एक सरकारी डिग्री."
"और अगर वो पढ़ाई पूरी करने के बाद वापस लौट गये, तो भारत में डॉक्टरों की जो कमी है, वो वैसी की वैसी बनी रहेगी. ऐसी स्थिति में बढ़ी हुई सरकारी मेडिकल सीटों पर एनआरआई कोटा लागू करने का क्या फ़ायदा?"
डॉक्टर केके अग्रवाल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार अगर पैसा कमाने के लिए यह सब कर रही है तो वो ग़लत है.
उन्होंने कहा, "बेहतर स्थिति यह होती कि सरकार बढ़ी हुई सीटों को भारत के ही छात्रों के लिए रखती. मौजूदा स्थिति में मैं राजस्थान के प्रदर्शनकारी डॉक्टरों के साथ हूँ."
(इस कहानी से संबंधित डेटा रीसर्च बीबीसी के सहयोगी प्रशांत शर्मा ने की)
राज्यों के मेडिकल एजुकेशन विभाग के अनुसार गुजरात के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 181, हिमाचल प्रदेश में 22, हरियाणा में 20 और पंजाब में 45 सीटें एनआरआई कोटे के लिए निर्धारित की गई हैं.
इन राज्यों में भी एनआरआई कोटे से एमबीबीएस करने की सालाना फ़ीस 13 लाख से 19 लाख रुपये के बीच है.
गुजरात के मेडिकल एजुकेशन विभाग ने ये दावा किया कि उनके यहाँ एनआरआई कोटे के तहत सिर्फ़ उन स्टूडेंट्स को दाख़िला दिया जाता है जिनके माता-पिता या फिर वो ख़ुद एनआरआई हों.
इन पाँच राज्यों के अलावा बीबीसी ने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के मेडिकल एजुकेशन विभाग से भी बात की जिन्होंने दावा किया कि उनके राज्य में फ़िलहाल सिर्फ़ प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में ही एनआरआई कोटे की व्यवस्था है.
पर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कोटे के तहत छात्रों के एडमिशन से क्या प्रभाव हो सकते हैं? इसपर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डॉक्टर केके अग्रवाल ने बीबीसी से बातचीत में एक अन्य नज़रिया पेश किया.
डॉक्टर अग्रवाल ने कहा, "अगर यह मा
फ़िनलैंड में काम पूरा करने के लिए न ऑफिस आना ज़रूरी है, न ही तय समय पर काम शुरू करना. काम होना चाहिए चाहे आप जहां बैठकर करें.
मिका हर्कनन को फ़िनलैंड की राजधानी हेलसिंकी की सर्दियां नागवार लगती थीं, इसलिए छह महीने तक उन्होंने स्पेन में रहकर काम किया.उनकी पत्नी कुछ ही समय पहले मां बनी थी और छुट्टी पर चल रही थीं.
हर्कनन ने स्पेन के मलागा में किराये का घर लिया और वहीं से आईटी कंपनी में सीनियर टीम मैनेजर की नौकरी करते हुए परिवार को भी समय दिया.
उनके काम में अपनी टीम के 20 सदस्यों को मैनेज करना भी शामिल था. अब वह हेलसिंकी लौट आए हैं. उनका कहना है कि उनका समय "जितना सोचा था, उससे भी शानदार गुजरा."
हर्कनन ऑनलाइन मैसेजिंग टूल स्लैक और वीडियो कांफ्रेंस के ज़रिये अपने सहकर्मियों के संपर्क में रहते थे. बीच-बीच में वह फ़िनलैंड भी चले आते थे.
उनका शेड्यूल ऑफिस के घंटों में बंधा हुआ नहीं था, फिर भी वे महत्वपूर्ण बैठकों में फ़ोन पर संपर्क में रहते थे.
स्पेन का मौसम भी उनको रास आता था, जिसके बारे में उनको लगता है कि उससे उनकी उत्पादकता बढ़ती है.
हर्कनन अपनी आईटी कंपनी एंबिंशिया के पहले कर्मचारी थे जिनको इतनी दूर रहकर नौकरी करने की इजाज़त मिली. लेकिन यह कंपनी काम में लचीलेपन को बहुत पहले से तवज्जो दे रही थी.
न भी लिया जाए कि इस कोटे के तहत एनआरआई छात्र मेडिकल की पढ़ाई करने भारत आएंगे तो इसकी क्या गारंटी होगी कि पढ़ाई पूरी करने के बाद वो भारत में ही अपनी सेवाएं देंगे. ये बात सही है कि वो बहुत अधिक फ़ीस दे रहे हैं. लेकिन एमबीबीएस की डिग्री के लिए जो क़ीमत विदेशी होने के नाते वो देने वाले हैं, वो उनकी मुद्रा में बहुत कम होगी. यानी सस्ते में एक सरकारी डिग्री."
"और अगर वो पढ़ाई पूरी करने के बाद वापस लौट गये, तो भारत में डॉक्टरों की जो कमी है, वो वैसी की वैसी बनी रहेगी. ऐसी स्थिति में बढ़ी हुई सरकारी मेडिकल सीटों पर एनआरआई कोटा लागू करने का क्या फ़ायदा?"
डॉक्टर केके अग्रवाल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार अगर पैसा कमाने के लिए यह सब कर रही है तो वो ग़लत है.
उन्होंने कहा, "बेहतर स्थिति यह होती कि सरकार बढ़ी हुई सीटों को भारत के ही छात्रों के लिए रखती. मौजूदा स्थिति में मैं राजस्थान के प्रदर्शनकारी डॉक्टरों के साथ हूँ."
(इस कहानी से संबंधित डेटा रीसर्च बीबीसी के सहयोगी प्रशांत शर्मा ने की)