Wednesday, December 12, 2018

कितना वज़न होता है इनमें?

क्या एससी-एसटी एक्ट में संशोधन ने हिंदी पट्टी के सवर्णों को बीजेपी से दूर किया है?
और सबसे अहम सवाल तो ये है कि बीजेपी के लिए सबसे ज़्यादा वोट जुटाने वाले नरेंद्र मोदी की चमक फीकी पड़ रही है?
ग़ैर-एनडीए विपक्ष के पास अब इस बात पर आश्वस्त होने की पर्याप्त वजहें हैं कि 17वीं लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताक़त कमतर होगी.
मोदी के ख़िलाफ़ एक कामयाब महागठबंधन के लिए ज़रूरी है कि कांग्रेस और यू
ऑस्ट्रेलिया के कप्तान टिम पेन का कहना है कि नए मैदान में भारतीय टीम का सामना बेहद तेज़ पिच से होगा. पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान रिकी पॉन्टिंग भी पेन से सहमत दिख रहे हैं. उन्होंने कहा, ''मुझे लगता है कि पर्थ टीम इंडिया के मुक़ाबले हमारे खिलाड़ियों की ज़्यादा मदद करेगी.''
कंगारू टीम की तरफ़ से तेज़ गेंदबाज़ी की ज़िम्मेदारी मिशेल स्टार्क, जॉश हेज़लवुड, पैट कमिंस संभालेंगे. लेकिन भारतीय टीम भी ख़ाली हाथ नहीं है. टीम के पास अब ईशांत, बुमराह, मोहम्मद शामी और उमेश यादव/भुवनेश्वर कुमार जैसे गेंदबाज़ हैं. ऐसे में मुक़ाबला दिलचस्प होगा.
ये मैच इसलिए भी ख़ास है क्योंकि ऑप्टस मैदान में ड्रॉप-इन पिच है. लेकिन ये कौन सी पिच होती है और ड्रॉप-इन का मतलब क्या होता है?
ये ऐसी पिच होती है, जिसे मैदान या वेन्यू से दूर कहीं बनाया जाता है और बाद में स्टेडियम में लाकर बिछा दिया जाता है. इससे एक ही मैदान को कई अलग-अलग तरह के खेलों में इस्तेमाल किया जा सकता है.
सबसे पहले पर्थ  के क्यूरेटर जॉन मैले ने वर्ल्ड सिरीज़ क्रिकेट के मैचों के लिए ड्रॉप-इन पिचें बनाई थीं, जो साल 1970 के दशक में ऑस्ट्रेलियाई कारोबारी केरी पैकर ने आयोजित कराई थी.
पी, बिहार, बंगाल, आंध्रा, तमिलनाडु जैसे राज्यों के ग़ैर-एनडीए क्षत्रपों के बीच सही संतुलन बने.
लेकिन मोदी विरोधी महत्वाकांक्षी राजनेता सही तालमेल और समझदारी की राजनीति करने में नाकाम साबित हुए हैं जिससे संसदीय चुनावों में मोदी को सत्ता से बेदख़ल किया जा सके.
जो लोग टेस्ट क्रिकेट पसंद करते हैं, वो जानते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में मुक़ाबला हो और मैच  पर्थ में खेला जा रहा हो, तो इसका क्या मतलब होता है. यहां मैच होने का मतलब है तेज़ गेंदबाज़ों की चांदी और बल्लेबाज़ों के लिए तेज़ रफ़्तार लाल गेंद वाली आफ़त.
एडिलेड टेस्ट में जीतने वाली भारतीय टी
इस सिरीज़ में ये पिच इसलिए अहम थीं क्योंकि उसका ज़्यादातर क्रिकेट डुअल पर्पज़ वेन्यू, यानी ऐसे जगह खेला गया, जहां एक से ज़्यादा खेल हो सकते थे. इसकी वजह ये थी कि टूर्नामेंट के मैच क्रिकेट के प्रभुत्व वाले इलाक़े से बाहर हुए थे.
सफ़ेद बॉल, फ़्लडलाइट, हेल्मेट और रंगीन जर्सियों के अलावा ड्रॉप-इन पिचों को क्रिकेट मैचों को और दिलचस्प बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया था.
जानकारों का कहना है कि इन पिचों पर जब पांच दिन वाला मैच खेला जाता है तो शुरुआती दो दिन असामान्य उछाल की वजह से तेज़ गेंदबाज़ और फिरकी, दोनों को मदद मिलती है, जबकि उसके बाद बल्लेबाज़ को भी पर्याप्त मौक़ा मिलता है.
एसएक्रिकेट के मुताबिक़ ड्रॉप-इन पिचों के साथ ख़ास बात ये है कि चाहने पर इन्हें मैच शुरू होने से महज़ 24 घंटे पहले फ़िट किया जा सकता है, और मैच ख़त्म होने की कुछ ही देर बाद हटाया जा सकता है. हालांकि, मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड के क्यरेटर ऑफ़-सीज़न होने पर इन पिचों को हटाकर रखना ज़्यादा पसंद करते हैं.
म को दूसरा टेस्ट मैच पर्थ में खेलना है, लेकिन इस बार मैदान नया है. 14 दिसंबर से शुरू हो रहा है दूसरा मुक़ाबला पर्थ शहर के ऑप्टस स्टेडियम में खेला जाएगा. शहर की स्वान नदी के एक तरफ़  पर्थ मैदान है और दूसरी तरफ़ ऑप्टस.
पहला टेस्ट होने की वजह से मेज़बान या मेहमान, दोनों ही टीमों को नहीं पता कि पिच क्या रंग दिखाएगी. लेकिन सभी का अंदाज़ा है कि मौसम और माहौल के हिसाब से अतीत में जिस तरह पर्थ की पिच तेज़ गेंदबाज़ों की मदद करती रही, इस बार भी वही होगा.